मेरी कलम से

मैं ही हूँ। पत्रकार। टीवी वाला। अधूरा कवि। क्वार्टर लेखक। दो बटा तीन ब्लागर। कस्बा पर लिख लिख कर घिस दिया हूँ। फेसबुक पर ही लघु प्रेम कथा लिखा। लप्रेक कहते हैं। डर से प्रेरित होकर ड्रेरित काव्य लिखता हूँ। तारीफों और गालियों के पार मेरा जहाँ कहीं और है। सत्यम शिवम् सुंदरम् । झूठों का सरताज डरता है, फँसाने को फंदा फेंकता है। अंग्रेज़ी सीख लो वर्ना कह दो कि आती नहीं है। जंग लगे सपनों को फिर से सपना बनाने आया हूँ इक़बाल मोहब्बत का रहे, घुड़सवार बन कर आया हूँ

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Wednesday, 22 November 2017

मेरी फ़िल्म का विरोध हो रहा है।


मैं एक फ़िल्म बनाने जा रहा हूं। इस फ़िल्म में केवल विलेन होंगे। वही लोग विलेन होंगे जो अभी तक किसी न किसी प्रदेश में किसी फिल्म का प्रदर्शन टलवा सके हैं। पोस्टर जलवा सके हैं। डायरेक्टर को कोर्ट में टहलवा सके हैं। इन संगठनों और व्यक्तियों से अनुरोध हैं कि फिल्म बनने से पहले ही आकर मेरी फिल्म का विरोध कर दें। मैं उसका भी वीडियो बनाकर अपनी फिल्म में डालूंगा। कहानी इसी शॉट से शुरू होगी कि मेरी फ़िल्म का विरोध हो रहा है।
मेरी फिल्म का पोस्टर अभी नहीं बना है, इसलिए रास्ते से कोई भी पोस्टर उखाड़ लाएं और मेरे सामने फाड़ डालें। तोड़फोड़ के लिए दफ़्तर के बाहर गमले रखवा दिया हूं। बेझिझक तोड़ डालें। आप अच्छा काम कर रहे हैं। मैं ध्यान भटकाने वालों की रक्षा में हर वक्त आगे रहूंगा बस आप मेरी सुरक्षा का ध्यान रख लेना। मेरी नाक न काटें। चाहें तो प्लास्टिक सर्जन लेकर आएं, थोड़ी सर्जरी कराकर ठीक कर दें।
सेंसर बोर्ड का विस्तार होना चाहिए। इसका नाम समाज बोर्ड होना चाहिए। इसमें हर जाति समाज के संगठन के मुखिया होने चाहिए। राजपूत समाज, ब्राह्मण समाज, अंबेडकर समाज, सुन्नी समाज, शिया समाज, गोंड समाज, कश्यप समाज, कायस्थ समाज। सेंसर बोर्ड के मुखिया यही सारे समाज मिलकर तय करेंगे। समाज बोर्ड में फ़ैसला बहुमत से होगा।

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