अब यहां पर सांस लीजिए। 2016-17 के बजट में 20 भारतीय यूनिवर्सिटी को दुनिया की चोटी की 100 यूनिवर्सिटी में पहुंचाने के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की बात की जाती है। विज़न की बात थी, बजट की नहीं। मैंने गूगल सर्च के ज़रिये जितने भी उस साल के बजट हाईलाइट्स देखे हैं उसमें एक नया पैसे का ज़िक्र नहीं है। अगले साल यानी 2017-18 के बजट का विश्लेषण करते हुए हफिंग्टन पोस्ट में श्याम कृष्णकुमार लिखते हैं कि टॉप यूनिवर्सिटी के लिए मात्र 50 करोड़ का प्रावधान किया जाता है। पटना में प्रधानमंत्री मोदी अपनी तरफ से 10,000 करोड़ का एलान कर देते हैं। दो साल से बजट जिस विज़न की बात करता है, उसका बजट पटना में अचानक 10,000 करोड़ हो जाता है। संसद को भी पता नहीं है। वित्त मंत्री छोड़िए, मानव संसाधन मंत्री को भी पता नहीं है।
2016-17 के बजट के संदर्भ में मीडिया रिपोर्ट में उच्च शिक्षा संस्थानों के बुनियादी ढांचे के लिए 1000 करोड़ के प्रावधान की तारीफ ज़रूर सुनी जो समस्या की विकरालता के सामने कुछ भी नहीं है। अब आप समझ गए होंगे कि मंशा समस्या दूर करना नहीं है, समस्या दूर करने के नाम पर एक ‘ इमेज’ खड़ा कर देना है ताकि आपकी आंखों के सामने पर्दा पड़ जाए और आप ताली बजाने लगे।
उसी तरह केंद्रीय यूनिवर्सिटी की मांग का भी कोई तुक नहीं। एक बेतुकी मांग को बेतुके प्रस्ताव से ख़ारिज कर देने पर चुप्पी साध लेनी चाहिए और ग़ौर से देखना चाहिए कि हमारे प्रधानमंत्री वाकई किसी समस्या तक गहराई से पहुंचते हैं या फिर उन्हें सिर्फ वोट तक ही पहुंचना आता है। मैं कशिश न्यूज़ चैनल पर संतोष सिंह के साथ पटना की लड़कियों को बोलते सुन रहा था। अच्छा लगा कि लड़कियां प्रधानमंत्री के भाषण पर खुल कर सवाल कर रही हैं मगर क्या वे सही मांग कर रही हैं ? क्या उन्हें पता है कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी की हालत क्या है? जिस तरह से प्रधानमंत्री ने समस्या के समाधान को एक बड़ी राशि की छवि पर शिफ्ट कर दिया उसी तरह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना यूनिवर्सिटी की समस्या के समाधान को सेंट्रल यूनिवर्सिटी मिलने की छवि पर शिफ्ट कर दिया। अब छात्रों के पास दो छवियां हैं। दो इमेज है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा और दस हज़ार करोड़ का प्रस्ताव। दोनों ही झांसा है। दोनों अपनी जवाबदेही से किनारा कर चले गए और छात्राएं अपनी आधी अधूरी जागरूकता को मुखर करती रहीं।
लेख लंबा है, इसलिए कस्बा पर पोस्ट किया है और उसका लिंक दिया है। कुछ लोग कहते हैं कि लंबा लेख नहीं पढ़ा जाता। ऐसे लोगों से सहानुभूति है। तीन घंटे के रिसर्च के बाद लेख लंबा तो होगा ही। आप सिर्फ पढ़ने के लिए मेहनत नहीं करना चाहते. अजीब बात है।
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