मेरी कलम से

मैं ही हूँ। पत्रकार। टीवी वाला। अधूरा कवि। क्वार्टर लेखक। दो बटा तीन ब्लागर। कस्बा पर लिख लिख कर घिस दिया हूँ। फेसबुक पर ही लघु प्रेम कथा लिखा। लप्रेक कहते हैं। डर से प्रेरित होकर ड्रेरित काव्य लिखता हूँ। तारीफों और गालियों के पार मेरा जहाँ कहीं और है। सत्यम शिवम् सुंदरम् । झूठों का सरताज डरता है, फँसाने को फंदा फेंकता है। अंग्रेज़ी सीख लो वर्ना कह दो कि आती नहीं है। जंग लगे सपनों को फिर से सपना बनाने आया हूँ इक़बाल मोहब्बत का रहे, घुड़सवार बन कर आया हूँ

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Friday, 20 October 2017

हिमाचल में सुखराम आ रहे हैं, अयोध्या में श्री राम आ रहे हैं।
21 वीं सदी के भारत की कल्पना का सारा ईंवेंट मैनेजमेंट हवा में उड़ गया है। उस पर सवाल होने लगे हैं। प्रमाण माँगे जा रहे हैं। नारे हारे-हारे लग रहे हैं। पुराने नारों का ही बैकलॉग इतना हो गया है कि नए नारे मिल नहीं रहे हैं। सौभाग्य-दुर्भाग्य, नसीब-बदनसीब जैसे विपरीतार्थक निरर्थक हो चुके हैं। इसलिए जनता की निगाहों को शिफ्ट किया जा रहा है। जनता दायें ताकती है तो उसे बायें तकाने के जुगाड़ किए जा रहे हैं। शहर में गंदगी है मगर स्वच्छता का ईवेंट है। करोड़ों की बेरोज़गारी है मगर स्किल इंडिया का ईवेंट है। हर समस्या के समानांंतर एक ईवेट की रेखा है।
त्रेतायुग के ईवेंट का आयोजन शानदार था। आयोजन पर आप सवाल नहीं कर सकते हैं और न ही प्रमाण मांग सकते हैं। आयोजकों को पता है कि भगवान राम के नाम पर राजनीति को वॉकओवर मिल जाता है। हिमाचल में सुखराम आ रहे हैं, अयोध्या में श्री राम आ रहे हैं।आयोजन ही प्रयोजन है। ईवेंट ही डेवलपमेंट है। गर्वनमेंट अपने आप में एक ईवेंट है।
जो काम मेले वाले ख़ुद कर लेते हैं, शहर की आयोजन समितियां कर लेती हैं, अब वही काम सरकारें भी करने लगी हैं। इस देश में एक से एक रामलीलाएं होती हैं। यह एक पैटर्न की तरह हो रहा है। अप्रैल में सूरत और जून में राजकोट में ख़ास रास्ते और चौराहों को प्रधानमंत्री के रोड शो के लिए सजाया गया। शहर को ही वर्चुअल रियालिटी का हिस्सा बना दिया गया। सूरत और राजकोट को सजाने वाली कंपनियों का अयोध्या में कोई रोल था या नहीं?
यह परंपरा की पुनर्रचना नहीं है। यह फ़ेल होती राजनीतिक व्यवस्था को परंपराओं के वर्चुअल ईंवेंट से ढंक देने की विलासिता है। पहले शहर में सर्कस आता था तो लेज़र लाइट दूर दूर के मोहल्ले की छतों पर दौड़ती थी। उन्हें देख कर लोग सर्कस की तरफ भागते थे। सनसनी मच जाती थी। मैंने जून महीने में ब्लाग पर लिखा था कि 2019 की राजनीति में लेज़र सेट का बड़ा रोल होने वाला है। यह प्रचार का नया हथियार है जिसे सूरत, राजकोट और अयोध्या में आज़माया गया है। लोग चुनाव के समय सवाल नहीं करेंगे, मेला देखेंगे।
धर्म राजनीति का कवच है। इस कवच को उतारकर राजनीति मैदान में नहीं जा सकती है। जाएगी तो लोगों के सवालों से घिर जाएगी। धर्म का कवच पहन कर जाएगी तो लोग सवा नहीं करेंगे, पूजा करेंगे। साधु संत तो अब दिखते भी नहीं हैं। उनके रोल में अब नेता ही दिख रहे हैं। जब नेता ही आध्यात्म से लेकर पूजन तक कर रहे हैं तो संत लोग क्या कर रहे हैं।
राजनीति में जब पैसे का अतिरेक हुआ तो काला धन पैदा हुआ। अब राजनीति में धर्म का अतिरेक काला धर्म पैदा कर रहा है। काला धन की लड़ाई हार चुके हैं। काला धर्म की लड़ाई भी हारेंगे। बाकी आप समझदार हैं, नहीं भी हैं तो क्या ग़म है। एक तरफ सुखराम की जय बोलो, एक तरफ जय श्री राम बोलो। जीत तय है, बस इससे मतलब रखो।

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