मेरी कलम से

मैं ही हूँ। पत्रकार। टीवी वाला। अधूरा कवि। क्वार्टर लेखक। दो बटा तीन ब्लागर। कस्बा पर लिख लिख कर घिस दिया हूँ। फेसबुक पर ही लघु प्रेम कथा लिखा। लप्रेक कहते हैं। डर से प्रेरित होकर ड्रेरित काव्य लिखता हूँ। तारीफों और गालियों के पार मेरा जहाँ कहीं और है। सत्यम शिवम् सुंदरम् । झूठों का सरताज डरता है, फँसाने को फंदा फेंकता है। अंग्रेज़ी सीख लो वर्ना कह दो कि आती नहीं है। जंग लगे सपनों को फिर से सपना बनाने आया हूँ इक़बाल मोहब्बत का रहे, घुड़सवार बन कर आया हूँ

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Friday, 20 October 2017

राजधानी एक्सप्रेस के इंजन

बुलेट ट्रेन से संबंधित सारे विवाद थम चुके हैं। जिसे जो कहना था, कह लिया। इस बहस के दोनों पक्षों को सुनते मैंने हिसाब लगाने की कोशिश कि एक राजधानी ट्रेन कितने में पटरी पर आ जाती होगी। इधर उधर से कुछ जानकारी जुटाई है।
आमतौर पर एक राजधानी में इंजन के अलावा दो पावर कार, थ्री एसी के बारह कोच, सेकेंड एसी के छह कोच, फ़र्स्ट एसी के तीन कोच होते हैं।
एक इंजन चौबीस पचीस करोड़ का आता है। एक कोच की कीमत दो से तीन करोड़ की होती है। हर श्रेणी के कोच की कीमत में पंद्रह से पचास लाख का अंतर होता है। इस तरह हिसाब करें तो राजधानी एक्सप्रेस की कुल कीमत अस्सी करोड़ के करीब होती है। अब एक बुलेट ट्रेन पर ट्रेन सहित नया ढांचा तैयार करने में हम एक लाख करोड़ ख़र्च करने वाले हैं। अगर हम इस एक लाख में अस्सी करोड़ से भाग कर हिसाब लगाए तो पता चलेगा कि एक बुलेट ट्रेन के ख़र्चे में 1250 राजधानी एक्सप्रेस आ सकती है। ये आंकड़ा मोटामोटी सही है । किसी के पास और जानकारी हो तो सुधार की गुज़ाइश है।
मुझे नहीं पता इस वक्त कितनी राजधानी एक्सप्रेस है और कितनी उसकी बाद की कैटेगरी की। अगर हम तेरह सौ राजधानी एक्सप्रेस लाँच कर दें तो भारतीय रेल की औसत गति एक ही बार में या कम समय और कम लागत में बढ़ जाएगी। कई एक्सप्रेस और सुपर फास्ट ग़ायब हो जाएँगी। हर दूसरी ट्रेन राजधानी हो सकती है ।
क्या इस हिसाब से देखना सही रहेगा? वैसे कुछ दिन पहले पटना राजधानी आठ घंटे लेट आई थी।

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