मेरी कलम से

मैं ही हूँ। पत्रकार। टीवी वाला। अधूरा कवि। क्वार्टर लेखक। दो बटा तीन ब्लागर। कस्बा पर लिख लिख कर घिस दिया हूँ। फेसबुक पर ही लघु प्रेम कथा लिखा। लप्रेक कहते हैं। डर से प्रेरित होकर ड्रेरित काव्य लिखता हूँ। तारीफों और गालियों के पार मेरा जहाँ कहीं और है। सत्यम शिवम् सुंदरम् । झूठों का सरताज डरता है, फँसाने को फंदा फेंकता है। अंग्रेज़ी सीख लो वर्ना कह दो कि आती नहीं है। जंग लगे सपनों को फिर से सपना बनाने आया हूँ इक़बाल मोहब्बत का रहे, घुड़सवार बन कर आया हूँ

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Friday, 20 October 2017

आज आपको एक शख़्स से मिलवाना चाहता हूँ। फ़िल्मकार गिरीश मकवाना। गिरीश ने अंग्रेजी में एक फिल्म बनाई है the colour of darkness. इस फिल्म का निर्देशन, संगीत, गीत लेखन और स्क्रीप्ट लेखन गिरीश ने ही किया है। गिरीश के शरीर और मन ने पोलियो और जाति का दंश झेला है। उनकी जाति का ज़िक्र इसलिए जरूरी है कि समाज के एक अहंकारी तबके ने उन्हें और उनके परिवार को तरह तरह तानों और ज़ुल्मों से प्रताड़ित किया। गुजरात के वणकर समाज से आते हैं। अनूसुचित जाति।
गिरीश ने कहा कि सामाजिक मनौवैज्ञानिक और शारीरिक विकलांगता झेला हूँ। गुजरात के एक गाँव से निकलकर गिरीश ने गुजरात में माइक्रोबायोलजी की पढ़ाई की। उसके बाद बड़ौदा से तबला में मास्टर किया। फिर स्कालरशिप पर ऑस्ट्रेलिया जाते हैं वहां म्यूज़िक परफ़ॉर्मेंस में पी एच डी करते हैं। आस्ट्रेलिया में भारतीय संगीत का ख़ूब प्रचार भी किया है। फिर उनका मन फिल्म की तरफ बढ़ता है तो फिल्म निर्माण और निर्देशन का कोर्स करते हैं।
2009-10 में आस्ट्रेलिया में कुछ भारतीय छात्रों के ख़िलाफ़ हिंसा होती है। उस हिंसा की पड़ताल में गिरीश वहाँ के समाज में मौजूद नस्ल भेद की जड़ों को टटोलते हुए फिल्म लिखने लगते हैं। वहाँ की कहानी में उनकी अपनी कहानी याद आने लगती है। सुना और देखा हुआ यथार्थ। कैसे अंधेरे का लाभ उठा कर ऊँची जाति के लोगों ने लाठियों से घर वालों की पिटाई की थी। नस्लभेद पर बन रही फिल्म जाति भेद को भी समेट लेती है। कहानी गुजरात से लेकर मेलबर्न की हो जाती है।
आप इस शख्स से मिलिए। संगीत में जो महारत है, इनके कंपोज़िशन और डायरक्शेन से,आप स्तब्ध हो जाएँगे। ज़िंदगी में इतनी कटुता झेलने के बाद भी फिल्म के गाने में इतना प्यार है कि उसे यू ट्यूब और सावन पर सुनकर आपकी दिवाली धन्य हो जाएगी। उनकी फिल्म the colour of darkness रिलीज़ हो गई है। गुजरात और मुंबई के तीन सिनेमा घरों में लगी है। जयपुर में भी लगी है। बाकी जगह थियेटर नहीं मिल रहा है।
स्वाभिमानी निर्देशक हैं। छुआछूत झेला है इसलिए अछूत शब्द हटा देने के सेंसर बोर्ड के आग्रह को ठुकरा दिया । इनकी प्रोड्यूसर लॉरेन का भी आभार जो इतनी उदारता से पूरा गाना हमें शो के लिए दे दिया। इतना ख़ूबसूरत और क्लासिक गाना शायद ही कोई प्रोड्यूसर किसी चैनल को देता होगा। मेरे हिसाब से यह इस साल का बेहतरीन गाना है। गाने हिन्दी में है।
सैराट के नागराज मंजुले का अपना सामाजिक अनुभव उनकी फ़िल्मों में आता है। गिरीश का सामाजिक अनुभव ग्लोबल यथार्थ से टकराता है। फिल्म निर्माण के मामले में दोनों बालीवुड के मौजूदा सभी फ़िल्मकारों से सौ मील आगे हैं। तब भी आपको गिरीश मकवाना पर एक ढंग का लेख नहीं मिलेगा। मोहब्बत का दिया जलता रहे। दिवाली से बेहतर कोई और मौका नहीं हो सकता था गिरीश से मिलवाने का । आप सभी को भी दिवाली की शुभकामनाएँ
2014 में मेलबर्न में गिरीश मकवाना की प्रतिभा से प्रभावित अमिताभ बच्चन ने उन्हें गले लगा लिया था

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