मेरी कलम से

मैं ही हूँ। पत्रकार। टीवी वाला। अधूरा कवि। क्वार्टर लेखक। दो बटा तीन ब्लागर। कस्बा पर लिख लिख कर घिस दिया हूँ। फेसबुक पर ही लघु प्रेम कथा लिखा। लप्रेक कहते हैं। डर से प्रेरित होकर ड्रेरित काव्य लिखता हूँ। तारीफों और गालियों के पार मेरा जहाँ कहीं और है। सत्यम शिवम् सुंदरम् । झूठों का सरताज डरता है, फँसाने को फंदा फेंकता है। अंग्रेज़ी सीख लो वर्ना कह दो कि आती नहीं है। जंग लगे सपनों को फिर से सपना बनाने आया हूँ इक़बाल मोहब्बत का रहे, घुड़सवार बन कर आया हूँ

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Wednesday, 22 November 2017

सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई कर रहे जज की मौत क्या ?



अगर आपकी पत्रकारिता में दिलचस्पी है तो caravan की इस रिपोर्ट को दो बार पढ़िए। रिपोर्टर निरंजन टाकले ने तीन साल पहले हुई सीबीआई के जज ब्रृजगोपाल लोया की मौत का ब्यौरा पेश किया है जिसे पढ़ते हुए आपकी हड्डियों में सिहरन हमेशा के लिए ठहर जाएगी। जस्टिस लोया मुंबई में सीबीआई जज के रूप में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें मुख्य आरोपी अमित शाह थे। 1 दिसंबर 2014 को उनकी नागपुर में मौत हो गई थी। जस्टिस लोया का परिवार आज भी भय से बोलने की स्थिति में नहीं हैं मगर उनकी बहनों ने जो ब्यौरा दिया है, उसे पढ़ते हुए आप निहत्थे और असहाय हो जाते हैं। काश वो सब सच न हो। अगर वो सच है तो फिर कोई महफ़ूज़ नहीं है।
लोया की बहन ने बताया कि नागपुर में दिल का दौरा पड़ने से मौत होती है। वहां जिस अस्पताल में ले जाया गया, वो बेहद संदिग्ध किस्म का है। वहां ईसीजी मशीन काम नहीं कर रही थी। एक जज को सीने में दर्द की शिकायत पर आटो रिक्शा में ले जाया गया जबकि उनके साथ दो जज मुंबई से नागपुर गए थे। दोनों के कहने पर ही जस्टिस लोया नागपुर जाने के लिए तैयार हुए थे। बहन ने बताया कि जब नागपुर से शव आया तब एंबुलेंस में सिर्फ ड्राईवर था। कोई सुरक्षा नहीं, उनके साथ गए जज तक नहीं थे। मुंबई से जब परिवार आया तो कुछ जज थे मगर उनमें से एक परिवार को हिदायत दे रहे थे कि किसी से बात नहीं करनी है। इस बीच रिपोर्ट में आर एस एस के शख्स का नाम उभरता है जो बहन के पास पहुंच जाता है ।
यह वाक़ई डरा देना वाली रिपोर्ट है। प्रशांत भूषण ने इसे साझा किया तब जाकर नज़र पड़ी। आप इस रिपोर्ट को पढ़िए। सारा अनुवाद करना मुश्किल है। रिपोर्ट के अंदर जो सवाल उठाए गए हैं उन्हें काफी सावधानी और ज़िम्मेदारी से लिखा गया है। वरना सबको पता है कि अमित शाह के ख़िलाफ़ लिखने का आजकल क्या मतलब है। मगर आपको पता होना चाहिए कि तीन साल बाद एक जज की मौत जिसे मीडिया ने सामान्य माना था, उसी मीडिया का कोई निरंजन उसकी पड़ताल कर तीन साल बाद उस स्टोरी को पहाड़ की तरह हम सबके सामने खड़ी कर देता है। इस रिपोर्ट को पढ़ना आसान नहीं है।
कमेंट करने वाले बहुत आ जाते हैं। अगर आपने रिपोर्ट नहीं पढ़ी है तो कमेंट न पढ़ें। नहीं पढ़ सकते तो छोड़ कर गुज़र जाइये। गाली देने वाले तो नहीं ही पढ़ते हैं जो नहीं देते हैं उनमें से भी कई बार शेयर की गई रिपोर्ट नहीं पढ़ते।

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