31 दिसंबर की शाम आधी रात तक पहुंचने के लिए बेक़रार है।
Independence
10:49
नए साल को लेकर इतनी गुदगुदी और घबराहट कभी नहीं हुई थी। मफलरमैन की तरह यह साल आ रहा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे महबूब चौक तक आ गया है। सहेल...
मैं ही हूँ। पत्रकार। टीवी वाला। अधूरा कवि। क्वार्टर लेखक। दो बटा तीन ब्लागर। कस्बा पर लिख लिख कर घिस दिया हूँ। फेसबुक पर ही लघु प्रेम कथा लिखा। लप्रेक कहते हैं। डर से प्रेरित होकर ड्रेरित काव्य लिखता हूँ। तारीफों और गालियों के पार मेरा जहाँ कहीं और है। सत्यम शिवम् सुंदरम् । झूठों का सरताज डरता है, फँसाने को फंदा फेंकता है। अंग्रेज़ी सीख लो वर्ना कह दो कि आती नहीं है। जंग लगे सपनों को फिर से सपना बनाने आया हूँ इक़बाल मोहब्बत का रहे, घुड़सवार बन कर आया हूँ
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